Vishnu sahasranamam ms subbulakshmi full version original

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"SINdhu_ShRuthI S" - 26/10/18

Please friends.. who ever seeing this video please please pray for my peripa. He has brain operations now. Treatment is under going. Kidney also failure. But still I have faith in our Goddess Vishnu. Please request you all to keep prayer for him also. Please please ..

"Astro with Ashish" - 02/09/18

शास्त्रों में विष्णु को पालन अर्थात जीवन की आधारभूत आवश्यकताओं की पूर्ति करने वाले देव के रूप में परिभाषित किया गया है। अर्थात चाहे वह मनुष्य के विद्या ग्रहण की बात हो या फिर विवाह की। विवाह के पश्चात संतान प्राप्ति की बात हो या फिर संतान की उन्नति की, हर कार्य में भगवान विष्णु की कृपा के बगैर सफलता नहीं मिल सकती। भगवान विष्णु को बृहस्पति या गुरु भी कहा गया है। नक्षत्र विज्ञान में बृहस्पति को सबसे बड़ा ग्रह बताया गया है। ज्योतिष शास्त्र में तो कन्या के विवाह का कारक ग्रह बृहस्पति को ही माना गया है। महाकाव्य महाभारत के ‘अनुशासन पर्व’ नामक अध्याय में भगवान विष्णु के एक हजार नामों का उल्लेख है। कहा जाता है कि जब भीष्म पितामह बाणों की शय्या पर लेटे अपनी इच्छा मृत्यु के काल चयन की प्रतीक्षा कर रहे थे, तब उन्होंने ये एक हजार नाम युधिष्ठिर को बताये थे। तथ्य यह है कि ज्ञान अर्जन की अभिलाषा में जब युधिष्ठिर ने भीष्मपितामह से यह पूछा कि ‘किमेकम दैवतम लोके, किम वाप्येकम परयणम’ अर्थात कौन ऐसा है, जो सर्व व्याप्त है और सर्व शक्तिमान है? तो पितामह ने अपने संवाद में भगवान विष्णु के इस एक हजार नामों का उल्लेख किया और कहा कि प्रत्येक युग में सभी अभीष्ठ की प्राप्ति के लिये, इन एक हजार नामों का श्रवण और पठन सबसे उत्तम होगा। विष्णु सहस्रनाम की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि हिन्दू धर्म के दो प्रमुख सम्प्रदाय शैव और वैष्णवों के मध्य यह सेतु का कार्य करता है। विष्णु सहस्रनाम में विष्णु को शम्भु, शिव, ईशान और रुद्र के नाम से सम्बोधित किया है, जो इस तथ्य को प्रतिपादित करता है कि शिव और विष्णु एक ही है। आदि शंकराचार्य ने भी इस बात की पुष्टि की है। पाराशर भट्टर ने विष्णु को शिव के नाम से सम्बोधित किये जाने को विशेषण बताया है, अर्थात शिव रूपी शाश्वत सत्य को विष्णु के पर्यायवाची के रूप में व्यक्त किया गया है। विष्णु सहस्रनाम के आधार पर ‘कैवल्य उपनिषद’ में विष्णु को ब्रह्मा और शिव का स्वरूप बताया गया है। कर्म प्रधान है सहस्रनाम सनातन सम्प्रदाय में धर्म को कभी भी जन के समूह के रूप में व्यक्त नहीं किया गया है। धर्म को विशेष रूप से मनुष्य के कर्तव्य के निष्पादन के रूप में प्रकट किया गया है, जिसे हम कर्म भी कहते हैं। विष्णु सहस्रनाम भी कर्म प्रधान है अर्थात इन एक हजार नामों में मनुष्य के मानव धर्म को बताया गया है। मनुष्य द्वारा मानसिक और शारीरिक रूप से सम्पादित होने वाले कर्मों की विवेचना और उनके फलों का उल्लेख है। जैसे सहस्रनाम में 135वां नाम ‘धर्माध्यक्ष’ है। अर्थ है कि धर्म का निर्वहन अर्थात कर्म के अनुसार मनुष्य को पुरस्कार या दंड देने वाले देव। इसी तरह 32वां नाम ‘विधाता’ और 609वां नाम ‘भावना’ इस तथ्य को प्रतिपादित करते हैं। ‘ब्रह्म सूत्र’ नामक ग्रंथ में भी धर्म को कर्म की प्रकृति की श्रेणी बताते हुए विष्णु सहस्रनाम का उल्लेख किया गया है। एक श्लोकी विष्णु सहस्रनाम स्त्रोत्र मंत्र नमो स्तवन अनंताय सहस्त्र मूर्तये, सहस्त्रपादाक्षि शिरोरु बाहवे। सहस्त्र नाम्ने पुरुषाय शाश्वते, सहस्त्रकोटि युग धारिणे नम:।। यह एक श्लोक है, जिस का प्रभाव उतना ही है, जितना कि विष्णु सहस्रनाम स्त्रोत्र का है। यदि प्रतिदिन प्रात: काल इस एक श्लोक का पाठ किया जाये तो जीवन में आने वाली कठिनाइयों से मुक्ति मिलती है। प्रत्येक समस्या का समाधान छिपा है विष्णु सहस्रनाम चूंकि संस्कृत में है और उच्चारण भी कठिन है, अत: यदि कोई इसका श्रवण मात्र भी करे तो उसे लाभ अवश्य मिलता है। वे लोग जो आर्थिक विपदा से गुजर रहे हैं, कर्ज की अधिकता है और पारिवारिक शांति भी नहीं है, ऐसे लोग यदि नित्य इस स्त्रोत्र का श्रवण भी करते हैं तो समस्या से मुक्ति मिलती है। शास्त्रों में लिखा गया है कि केले के पेड़ को विष्णु स्वरूप मान कर यदि प्रत्येक गुरुवार को पूजा की जाये और उसके नीच बैठ कर विष्णु सहस्रनाम का पाठ किया जाये तो विवाह में आ रही बाधा दूर होती है। जिन कन्याओं का गुरु नीच का है या राहुयुक्त है, वे यदि विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें तो यह दोष दूर होता है और योग्य वर मिलता है। ग्रंथों में यह भी उल्लेख है कि यकृत यानी लीवर से सम्बंधित व्याधि जैसे पीलिया, हेपेटाइटिस या सिरोसिस आदि में भी विष्णु सहस्रनाम के पाठ से लाभ मिलता है।

"Vaishnavsingh Vaishnav" - 17/11/18

Om namo bagavathe vasu devya namaha

"Pavani Varahagiri" - 15/08/18

Vishnu sahasranamam is a medicine for every problem

"Sachin kulkarni" - 23/10/18

रचन: वेद व्यास ॐ शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् । प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ॥ 1 ॥ यस्यद्विरदवक्त्राद्याः पारिषद्याः परः शतम् । विघ्नं निघ्नन्ति सततं विश्वक्सेनं तमाश्रये ॥ 2 ॥ व्यासं वसिष्ठ नप्तारं शक्तेः पौत्रमकल्मषम् । पराशरात्मजं वन्दे शुकतातं तपोनिधिम् ॥ 3 ॥ व्यासाय विष्णु रूपाय व्यासरूपाय विष्णवे । नमो वै ब्रह्मनिधये वासिष्ठाय नमो नमः ॥ 4 ॥ अविकाराय शुद्धाय नित्याय परमात्मने । सदैक रूप रूपाय विष्णवे सर्वजिष्णवे ॥ 5 ॥ यस्य स्मरणमात्रेण जन्मसंसारबन्धनात् । विमुच्यते नमस्तस्मै विष्णवे प्रभविष्णवे ॥ 6 ॥ ॐ नमो विष्णवे प्रभविष्णवे । श्री वैशम्पायन उवाच श्रुत्वा धर्मा नशेषेण पावनानि च सर्वशः । युधिष्ठिरः शान्तनवं पुनरेवाभ्य भाषत ॥ 7 ॥ युधिष्ठिर उवाच किमेकं दैवतं लोके किं वा‌உप्येकं परायणं स्तुवन्तः कं कमर्चन्तः प्राप्नुयुर्मानवाः शुभम् ॥ 8 ॥ को धर्मः सर्वधर्माणां भवतः परमो मतः । किं जपन्मुच्यते जन्तुर्जन्मसंसार बन्धनात् ॥ 9 ॥ श्री भीष्म उवाच जगत्प्रभुं देवदेव मनन्तं पुरुषोत्तमम् । स्तुवन्नाम सहस्रेण पुरुषः सततोत्थितः ॥ 10 ॥ तमेव चार्चयन्नित्यं भक्त्या पुरुषमव्ययम् । ध्यायन् स्तुवन्नमस्यंश्च यजमानस्तमेव च ॥ 11 ॥ अनादि निधनं विष्णुं सर्वलोक महेश्वरम् । लोकाध्यक्षं स्तुवन्नित्यं सर्व दुःखातिगो भवेत् ॥ 12 ॥ ब्रह्मण्यं सर्व धर्मज्ञं लोकानां कीर्ति वर्धनम् । लोकनाथं महद्भूतं सर्वभूत भवोद्भवम्॥ 13 ॥ एष मे सर्व धर्माणां धर्मो‌உधिक तमोमतः । यद्भक्त्या पुण्डरीकाक्षं स्तवैरर्चेन्नरः सदा ॥ 14 ॥ परमं यो महत्तेजः परमं यो महत्तपः । परमं यो महद्ब्रह्म परमं यः परायणम् । 15 ॥ पवित्राणां पवित्रं यो मङ्गलानां च मङ्गलम् । दैवतं देवतानां च भूतानां यो‌உव्ययः पिता ॥ 16 ॥ यतः सर्वाणि भूतानि भवन्त्यादि युगागमे । यस्मिंश्च प्रलयं यान्ति पुनरेव युगक्षये ॥ 17 ॥ तस्य लोक प्रधानस्य जगन्नाथस्य भूपते । विष्णोर्नाम सहस्रं मे श्रुणु पाप भयापहम् ॥ 18 ॥ यानि नामानि गौणानि विख्यातानि महात्मनः । ऋषिभिः परिगीतानि तानि वक्ष्यामि भूतये ॥ 19 ॥ ऋषिर्नाम्नां सहस्रस्य वेदव्यासो महामुनिः ॥ छन्दो‌உनुष्टुप् तथा देवो भगवान् देवकीसुतः ॥ 20 ॥ अमृतां शूद्भवो बीजं शक्तिर्देवकिनन्दनः । त्रिसामा हृदयं तस्य शान्त्यर्थे विनियुज्यते ॥ 21 ॥ विष्णुं जिष्णुं महाविष्णुं प्रभविष्णुं महेश्वरम् ॥ अनेकरूप दैत्यान्तं नमामि पुरुषोत्तमम् ॥ 22 ॥ पूर्वन्यासः अस्य श्री विष्णोर्दिव्य सहस्रनाम स्तोत्र महामन्त्रस्य ॥ श्री वेदव्यासो भगवान् ऋषिः । अनुष्टुप् छन्दः । श्रीमहाविष्णुः परमात्मा श्रीमन्नारायणो देवता । अमृतांशूद्भवो भानुरिति बीजम् । देवकीनन्दनः स्रष्टेति शक्तिः । उद्भवः, क्षोभणो देव इति परमोमन्त्रः । शङ्खभृन्नन्दकी चक्रीति कीलकम् । शार्ङ्गधन्वा गदाधर इत्यस्त्रम् । रथाङ्गपाणि रक्षोभ्य इति नेत्रम् । त्रिसामासामगः सामेति कवचम् । आनन्दं परब्रह्मेति योनिः । ऋतुस्सुदर्शनः काल इति दिग्बन्धः ॥ श्रीविश्वरूप इति ध्यानम् । श्री महाविष्णु प्रीत्यर्थे सहस्रनाम जपे विनियोगः । करन्यासः विश्वं विष्णुर्वषट्कार इत्यङ्गुष्ठाभ्यां नमः अमृतां शूद्भवो भानुरिति तर्जनीभ्यां नमः  ब्रह्मण्यो ब्रह्मकृत् ब्रह्मेति मध्यमाभ्यां नमः सुवर्णबिन्दु रक्षोभ्य इति अनामिकाभ्यां नमः निमिषो‌உनिमिषः स्रग्वीति कनिष्ठिकाभ्यां नमः रथाङ्गपाणि रक्षोभ्य इति करतल करपृष्ठाभ्यां नमः अङ्गन्यासः सुव्रतः सुमुखः सूक्ष्म इति ज्ञानाय हृदयाय नमः सहस्रमूर्तिः विश्वात्मा इति ऐश्वर्याय शिरसे स्वाहा सहस्रार्चिः सप्तजिह्व इति शक्त्यै शिखायै वषट् त्रिसामा सामगस्सामेति बलाय कवचाय हुं रथाङ्गपाणि रक्षोभ्य इति नेत्राभ्यां वौषट् शाङ्गधन्वा गदाधर इति वीर्याय अस्त्रायफट् ऋतुः सुदर्शनः काल इति दिग्भन्धः

"Vaishnavsingh Vaishnav" - 17/11/18

God is great

"Manorama Suryanarayana" - 23/09/18

Dhanvantari. Thank you very much. The Great Carnatic Classical Vocalist Smt. M. S. Subbalaksmi's voice, so very wonderful to hear. Her pronouncations are so clear & voice so perfect! Her chanting never let's one get distracted, come what may. ಓಂ ನಮೋ ಭಗವತೆ ವಾಸುದೇವಾಯ. ಹರಿ ಓಂ.

"SWAMI KRISHNANANDA Krishnananda" - 26/08/18

I am chanting vishnusahasranama since 1973

"Smile With Poonam" - 17/02/18

I am always speechles whenever I listen vishnu sahaara naam in voice of M.S.Subulakshmi.......It is blessing on all of us..... .

"SURESH VYAS" - 29/09/18

श्रीराम राम रामेति रमे रामे मनोरमे। सहस्त्रनाम ततुल्यम राम नाम वरानने।।

"SWAMI KRISHNANANDA Krishnananda" - 26/08/18

Vishnusahasranama has 720 aksharas.we have 7,20,000 days and nights and if we chant for 100 years we will reach heaven

"Sanjiv K Pundir" - 03/09/18

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय

"Uttma Singh Bisht" - 19/11/18

हरि ओम्म हरि ओम्म हरि ओम्म नमो भगवते वासुदेवाय

"saurabh singh" - 29/07/18

शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् । प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ॥ १॥ यस्य द्विरदवक्त्राद्याः पारिषद्याः परः शतम् । विघ्नं निघ्नन्ति सततं विष्वक्सेनं तमाश्रये ॥ २॥ व्यासं वसिष्ठनप्तारं शक्तेः पौत्रमकल्मषम् । पराशरात्मजं वन्दे शुकतातं तपोनिधिम् ॥ ३॥ व्यासाय विष्णुरूपाय व्यासरूपाय विष्णवे । नमो वै ब्रह्मनिधये वासिष्ठाय नमो नमः ॥ ४॥ अविकाराय शुद्धाय नित्याय परमात्मने । सदैकरूपरूपाय विष्णवे सर्वजिष्णवे ॥ ५॥ यस्य स्मरणमात्रेण जन्मसंसारबन्धनात् । विमुच्यते नमस्तस्मै विष्णवे प्रभविष्णवे ॥ ६॥ ॐ नमो विष्णवे प्रभविष्णवे । श्रीवैशम्पायन उवाच --- श्रुत्वा धर्मानशेषेण पावनानि च सर्वशः । युधिष्ठिरः शान्तनवं पुनरेवाभ्यभाषत ॥ ७॥ युधिष्ठिर उवाच --- किमेकं दैवतं लोके किं वाप्येकं परायणम् । स्तुवन्तः कं कमर्चन्तः प्राप्नुयुर्मानवाः शुभम् ॥ ८॥ को धर्मः सर्वधर्माणां भवतः परमो मतः । किं जपन्मुच्यते जन्तुर्जन्मसंसारबन्धनात् ॥ ९॥ भीष्म उवाच --- जगत्प्रभुं देवदेवमनन्तं पुरुषोत्तमम् । स्तुवन् नामसहस्रेण पुरुषः सततोत्थितः ॥ १०॥ तमेव चार्चयन्नित्यं भक्त्या पुरुषमव्ययम् । ध्यायन् स्तुवन् नमस्यंश्च यजमानस्तमेव च ॥ ११॥ अनादिनिधनं विष्णुं सर्वलोकमहेश्वरम् । लोकाध्यक्षं स्तुवन्नित्यं सर्वदुःखातिगो भवेत् ॥ १२॥ ब्रह्मण्यं सर्वधर्मज्ञं लोकानां कीर्तिवर्धनम् । लोकनाथं महद्भूतं सर्वभूतभवोद्भवम् ॥ १३॥ एष मे सर्वधर्माणां धर्मोऽधिकतमो मतः । यद्भक्त्या पुण्डरीकाक्षं स्तवैरर्चेन्नरः सदा ॥ १४॥ परमं यो महत्तेजः परमं यो महत्तपः । परमं यो महद्ब्रह्म परमं यः परायणम् ॥ १५॥ पवित्राणां पवित्रं यो मङ्गलानां च मङ्गलम् । दैवतं दैवतानां च भूतानां योऽव्ययः पिता ॥ १६॥ यतः सर्वाणि भूतानि भवन्त्यादियुगागमे । यस्मिंश्च प्रलयं यान्ति पुनरेव युगक्षये ॥ १७॥ तस्य लोकप्रधानस्य जगन्नाथस्य भूपते । विष्णोर्नामसहस्रं मे शृणु पापभयापहम् ॥ १८॥ यानि नामानि गौणानि विख्यातानि महात्मनः । ऋषिभिः परिगीतानि तानि वक्ष्यामि भूतये ॥ १९॥ ऋषिर्नाम्नां सहस्रस्य वेदव्यासो महामुनिः ॥ छन्दोऽनुष्टुप् तथा देवो भगवान् देवकीसुतः ॥ २०॥ अमृतांशूद्भवो बीजं शक्तिर्देवकिनन्दनः । त्रिसामा हृदयं तस्य शान्त्यर्थे विनियोज्यते ॥ २१॥ विष्णुं जिष्णुं महाविष्णुं प्रभविष्णुं महेश्वरम् ॥ अनेकरूप दैत्यान्तं नमामि पुरुषोत्तमं ॥ २२ ॥ श्रीवेदव्यास उवाच --- ॐ अस्य श्रीविष्णोर्दिव्यसहस्रनामस्तोत्रमहामन्त्रस्य । श्री वेदव्यासो भगवान् ऋषिः । अनुष्टुप् छन्दः । श्रीमहाविष्णुः परमात्मा श्रीमन्नारायणो देवता । अमृतांशूद्भवो भानुरिति बीजम् । देवकीनन्दनः स्रष्टेति शक्तिः । उद्भवः क्षोभणो देव इति परमो मन्त्रः । शङ्खभृन्नन्दकी चक्रीति कीलकम् । शार्ङ्गधन्वा गदाधर इत्यस्त्रम् । रथाङ्गपाणिरक्षोभ्य इति नेत्रम् । त्रिसामा सामगः सामेति कवचम् । आनन्दं परब्रह्मेति योनिः । ऋतुः सुदर्शनः काल इति दिग्बन्धः ॥ श्रीविश्वरूप इति ध्यानम् । श्रीमहाविष्णुप्रीत्यर्थे सहस्रनामस्तोत्रपाठे विनियोगः ॥ ध्यानम् । क्षीरोदन्वत्प्रदेशे शुचिमणिविलसत्सैकतेर्मौक्तिकानां मालाकॢप्तासनस्थः स्फटिकमणिनिभैर्मौक्तिकैर्मण्डिताङ्गः । शुभ्रैरभ्रैरदभ्रैरुपरिविरचितैर्मुक्तपीयूष वर्षैः आनन्दी नः पुनीयादरिनलिनगदा शङ्खपाणिर्मुकुन्दः ॥ १॥ भूः पादौ यस्य नाभिर्वियदसुरनिलश्चन्द्र सूर्यौ च नेत्रे कर्णावाशाः शिरो द्यौर्मुखमपि दहनो यस्य वास्तेयमब्धिः । अन्तःस्थं यस्य विश्वं सुरनरखगगोभोगिगन्धर्वदैत्यैः चित्रं रंरम्यते तं त्रिभुवन वपुषं विष्णुमीशं नमामि ॥ २॥ ॐ शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम् । लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम् ॥ ३॥ मेघश्यामं पीतकौशेयवासं श्रीवत्साङ्कं कौस्तुभोद्भासिताङ्गम् । पुण्योपेतं पुण्डरीकायताक्षं विष्णुं वन्दे सर्वलोकैकनाथम् ॥ ४॥ नमः समस्तभूतानामादिभूताय भूभृते । अनेकरूपरूपाय विष्णवे प्रभविष्णवे ॥ ५॥ सशङ्खचक्रं सकिरीटकुण्डलं सपीतवस्त्रं सरसीरुहेक्षणम् । सहारवक्षःस्थलकौस्तुभश्रियं var स्थलशोभिकौस्तुभं नमामि विष्णुं शिरसा चतुर्भुजम् ॥ ६॥ छायायां पारिजातस्य हेमसिंहासनोपरि आसीनमम्बुदश्याममायताक्षमलंकृतम् । चन्द्राननं चतुर्बाहुं श्रीवत्साङ्कित वक्षसं रुक्मिणी सत्यभामाभ्यां सहितं कृष्णमाश्रये ॥ ७॥

"Sachin kulkarni" - 23/10/18

महेश्वासो महीभर्ता श्रीनिवासः सताङ्गतिः । अनिरुद्धः सुरानन्दो गोविन्दो गोविदां पतिः ॥ 20 ॥ मरीचिर्दमनो हंसः सुपर्णो भुजगोत्तमः । हिरण्यनाभः सुतपाः पद्मनाभः प्रजापतिः ॥ 21 ॥ अमृत्युः सर्वदृक् सिंहः सन्धाता सन्धिमान् स्थिरः । अजो दुर्मर्षणः शास्ता विश्रुतात्मा सुरारिहा ॥ 22 ॥ गुरुर्गुरुतमो धाम सत्यः सत्यपराक्रमः । निमिषो‌உनिमिषः स्रग्वी वाचस्पतिरुदारधीः ॥ 23 ॥ अग्रणीग्रामणीः श्रीमान् न्यायो नेता समीरणः सहस्रमूर्धा विश्वात्मा सहस्राक्षः सहस्रपात् ॥ 24 ॥ आवर्तनो निवृत्तात्मा संवृतः सम्प्रमर्दनः । अहः संवर्तको वह्निरनिलो धरणीधरः ॥ 25 ॥ सुप्रसादः प्रसन्नात्मा विश्वधृग्विश्वभुग्विभुः । सत्कर्ता सत्कृतः साधुर्जह्नुर्नारायणो नरः ॥ 26 ॥ असङ्ख्येयो‌உप्रमेयात्मा विशिष्टः शिष्टकृच्छुचिः । सिद्धार्थः सिद्धसङ्कल्पः सिद्धिदः सिद्धि साधनः ॥ 27 ॥ वृषाही वृषभो विष्णुर्वृषपर्वा वृषोदरः । वर्धनो वर्धमानश्च विविक्तः श्रुतिसागरः ॥ 28 ॥ सुभुजो दुर्धरो वाग्मी महेन्द्रो वसुदो वसुः । नैकरूपो बृहद्रूपः शिपिविष्टः प्रकाशनः ॥ 29 ॥ ओजस्तेजोद्युतिधरः प्रकाशात्मा प्रतापनः । ऋद्दः स्पष्टाक्षरो मन्त्रश्चन्द्रांशुर्भास्करद्युतिः ॥ 30 ॥ अमृतांशूद्भवो भानुः शशबिन्दुः सुरेश्वरः । औषधं जगतः सेतुः सत्यधर्मपराक्रमः ॥ 31 ॥ भूतभव्यभवन्नाथः पवनः पावनो‌உनलः । कामहा कामकृत्कान्तः कामः कामप्रदः प्रभुः ॥ 32 ॥ युगादि कृद्युगावर्तो नैकमायो महाशनः । अदृश्यो व्यक्तरूपश्च सहस्रजिदनन्तजित् ॥ 33 ॥ इष्टो‌உविशिष्टः शिष्टेष्टः शिखण्डी नहुषो वृषः । क्रोधहा क्रोधकृत्कर्ता विश्वबाहुर्महीधरः ॥ 34 ॥ अच्युतः प्रथितः प्राणः प्राणदो वासवानुजः । अपांनिधिरधिष्ठानमप्रमत्तः प्रतिष्ठितः ॥ 35 ॥ स्कन्दः स्कन्दधरो धुर्यो वरदो वायुवाहनः । वासुदेवो बृहद्भानुरादिदेवः पुरन्धरः ॥ 36 ॥ अशोकस्तारणस्तारः शूरः शौरिर्जनेश्वरः । अनुकूलः शतावर्तः पद्मी पद्मनिभेक्षणः ॥ 37 ॥ पद्मनाभो‌உरविन्दाक्षः पद्मगर्भः शरीरभृत् । महर्धिरृद्धो वृद्धात्मा महाक्षो गरुडध्वजः ॥ 38 ॥ अतुलः शरभो भीमः समयज्ञो हविर्हरिः । सर्वलक्षणलक्षण्यो लक्ष्मीवान् समितिञ्जयः ॥ 39 ॥ विक्षरो रोहितो मार्गो हेतुर्दामोदरः सहः । महीधरो महाभागो वेगवानमिताशनः ॥ 40 ॥ उद्भवः, क्षोभणो देवः श्रीगर्भः परमेश्वरः । करणं कारणं कर्ता विकर्ता गहनो गुहः ॥ 41 ॥ व्यवसायो व्यवस्थानः संस्थानः स्थानदो ध्रुवः । परर्धिः परमस्पष्टः तुष्टः पुष्टः शुभेक्षणः ॥ 42 ॥ रामो विरामो विरजो मार्गोनेयो नयो‌உनयः । वीरः शक्तिमतां श्रेष्ठो धर्मोधर्म विदुत्तमः ॥ 43 ॥ वैकुण्ठः पुरुषः प्राणः प्राणदः प्रणवः पृथुः । हिरण्यगर्भः शत्रुघ्नो व्याप्तो वायुरधोक्षजः ॥ 44 ॥ ऋतुः सुदर्शनः कालः परमेष्ठी परिग्रहः । उग्रः संवत्सरो दक्षो विश्रामो विश्वदक्षिणः ॥ 45 ॥ विस्तारः स्थावर स्थाणुः प्रमाणं बीजमव्ययम् । अर्थो‌உनर्थो महाकोशो महाभोगो महाधनः ॥ 46 ॥ अनिर्विण्णः स्थविष्ठो भूद्धर्मयूपो महामखः । नक्षत्रनेमिर्नक्षत्री क्षमः, क्षामः समीहनः ॥ 47 ॥ यज्ञ इज्यो महेज्यश्च क्रतुः सत्रं सताङ्गतिः । सर्वदर्शी विमुक्तात्मा सर्वज्ञो ज्ञानमुत्तमम् ॥ 48 ॥ सुव्रतः सुमुखः सूक्ष्मः सुघोषः सुखदः सुहृत् । मनोहरो जितक्रोधो वीर बाहुर्विदारणः ॥ 49 ॥

"Thirumalai Raghavan" - 01/10/18

Bagavane.........pls save me......

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